Detailed Notes on hindi poetry

मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला, जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला, आने वाले नए विश्व में तुम भी कुछ करके दिखाना बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०। प्रियतम, अपने ही हाथों स

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